महाकवि कालिदास का 'मेघदूतम्' साहित्य-जगत् की अमूल्य निधि है । कालिदास के इस काव्य में वैसे तत्कालीन उत्तर भारत के विभिन्न स्थलों का रमणीक चित्रांकन है, तथापि महाकवि का दो नगरियों से विशेष लगाव प्रदर्शित होता है : एक उज्जयिनी और दूसरी अलकापुरी । उज्जयिनी के चित्रांकन में महाकवि ने अपनी प्रतिभा के बहु आयामों का परिचय देते हुए उस पर १४ श्लोक रचे हैं । इस लगाव-विशेष का कारण कालिदास का उज्जयिनी-निवासी होना रहा है । अपनी मातृभूमि से भला कौन स्नेह नहीं करता ! उज्जयिनी के प्रति कालिदास का आग्रहपूर्ण लगाव इस सीमा तक पहुँचा है कि वे मेघ को सीधे और छोटे मार्ग को त्याग कर टेड़े मार्ग से उज्जयिनी होते हुए अलकापुरी जाने की सलाह तक दे डालते हैं । उज्जयिनी से सम्बन्धित श्लोकों का सिलसिलेवार प्रस्तुतीकरण मैं पहले फ़ेसबुक-पटल पर कर चुका हूँ । अलकापुरी चूँकि मेघ का गन्तव्य स्थल है और वहाँ उसके नायक यक्ष की प्रिया रहती है, अत: कालिदास अलकापुरी के वर्णन में भी लगभग इतने ही श्लोकों में अपने काव्य-कौशल की छटा बिखरते प्रतीत होते हैं ।
वैसे तो 'पूर्वमेघ' के अन्तिम श्लोक से ही गंगा की उपत्यका में बसी अलकापुरी का चित्रण प्रारम्भ हो जाता है, लेकिन अलकापुरी-वर्णन के शेष सभी श्लोक 'उत्तरमेघ' में स्थान पाये हैं । 'उत्तरमेघ' के प्रथम श्लोक 'विद्युत्वन्तं ललितवनिता....' को मैं सानुवाद पहले इसी पटल पर प्रकाशित कर चुका हूँ जिसमें अलकापुरी के भव्य उत्तुंग प्रासादों का अत्यन्त रमणीक चित्रण है । 'उत्तरमेघ' का दूसरा श्लोक अलकापुरी की सुन्दर अंगनाओं को समर्पित है । इस श्लोक में विभिन्न पुष्पों से सजी-धजी अलकापुरी की सुन्दर बालाओं का मनोहारी चित्र महाकवि ने प्रस्तुत किया है । उत्तरमेघ का यह श्लोक जहाँ उल्लेख अलंकार से चमत्कृत है, वहीं इस अर्थ में भी सविशेष है कि भारत में सभी ऋतुओं में खिलने वाले विभिन्न पुष्पों की उपलब्धता हर वक्त अलका में दर्शायी गयी है । कवि के प्रिय नायक की नगरी, भला, क्यों न सब लोकों से न्यारी हो !
शापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ
शेषान्मासान्गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा ।
पश्चादावां विरहगुणितं तं तमात्माभिलाषं
निर्विक्ष्याव: परिणतसरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥
आज कालिदास याद आ रहे हैं। कालिदास अपने शाप से मुक्ति के प्रति आश्वस्त हैं परन्तु हमें बंधन से मुक्त नहीं करा सके।
खैर मैं कालिदास को अपनी इच्छा के अनुकूल याद नहीं कर सका परंतु आपको कालिदास की कृतियों से परिचय करा देता हूं ।
महाकवि कालिदास महाकाव्य, खण्ड-काव्य तथा नाट्य-तीनों काव्यविधाओं की रचना में कुशल थे। कालिदास के परवर्ती संस्कृत-साहित्य पर इनका प्रभाव पड़ा है। यहां तक कि कई कवियों ने अमरता प्राप्त करने के लिये अपनी रचनाओं के साथ कालिदास का नाम भी जोड़ दिया। परिणामस्वरूप यह विषय निर्विवाद नहीं रह सका कि कालिदास की वास्तविक रचनायें कितनी हैं ? कालिदास के नाम पर विरचित जिन कृतियों का नाम लिया जाता है, उनमें प्रमुख कृतियाँ निम्नाङ्कित हैं
१. ऋतुसंहार २. कुमारसम्भव ३. मेघदूत ४. रघुवंश ५. मालविकाग्निमित्र ६. विक्रमोर्वशीय ७. अभिज्ञानशाकुन्तल ८. श्रुतबोध ९. राक्षसकाव्य १०. शृङ्गारतिलक ११. गङ्गाष्टक १२. श्यामलादण्डक १३. नलोदयकाव्य १४.पुष्पबाणविलास १५. ज्योतिर्विदाभरण १६. कुन्तलेश्वरदौत्य १७. लम्बोदर प्रहसन १८. सेतु-बन्ध तथा १९. कालिस्तोत्र आदि।
उक्त कृतियों में संख्या दो से लेकर संख्या सात तक की रचनायें निर्विवाद रूप से कालिदास की मानी जाती हैं। प्रथम कृति 'ऋतु-संहार' के बारे में विद्वान् एकमत नहीं है परन्तु परम्परा उसे भी कालिदास की कृति स्वीकार करती है । अतः इन्हीं सात कृतियों को कालिदास की रचना मानकर उनका परिचय दिया जा रहा है।
काव्य-विधा की दृष्टि से उक्त सात कृतियों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है -
१. गीति-काव्य अथवा खण्ड काव्य-(क) ऋतुसंहार (ख) मेघदूत । २. महाकाव्य-(क) कुमारसम्भव (ख) रघुवंश ।
३. नाट्य अथवा दृश्य काव्य—(क) मालविकाग्निमित्र (ख) विक्रमोर्वशीय (ग) अभिज्ञानशाकुन्तल।
इन सात कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है
१. ऋतुसंहार-यह कालिदास की प्रथम रचना मानी जाती है । इसमें कुल छ: सर्ग हैं और उनमें क्रमश: ग्रीष्म, वर्षा, शरद् , हेमन्त, शिशिर तथा वसन्त इन छ: ऋतुओं का अत्यन्त स्वाभाविक, सरस एवं सरल वर्णन है । इसमें ऋतुओं का सहृदयजनों के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव का भी हृदयग्राही चित्रण है । प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण हृदय को अत्यन्त आह्लादित करता है। इस काव्य में कालिदास की कमनीय शैली के दर्शन होने के कारण कुछ विद्वान् इसे कालिदास की रचना नहीं मानते।
२. मेघदूतम्-यह एक खण्ड-काव्य अथवा गीति-काव्य है । इसके दो भाग हैं(१) पूर्वमेघ (२) उत्तरमेघ । इसमें अपनी वियोग-विधुरा कान्ता के पास वियोगी यक्ष मेघ के द्वारा अपना प्रणय-संदेश भेजता है। पूर्वमेघ में महाकवि, रामगिरि से लेकर अलका तक के मार्ग का विशद वर्णन करते समय, भारतवर्ष की प्राकृतिक छटा का एक अतीव हृदयग्राही चित्र खडा कर देता है। वस्तुतः पूर्वमेघ में बाह्य-प्रकृति का सजीव चित्र आँखों के नाचने लगता है । उत्तरमेघ में मानव की अन्तः प्रकृति का ऐसा विशद चित्रण सहदय का चित्त-चञ्चरीक नाच उठता है।
इस खण्ड-काव्य ने कालिदास को सहृदय जनों के मानस मन्दिर में महनीय स्थान का भागी बना दिया है। इसकी महत्ता का आकलन इसी से किया जा सकता है कि इस पर लगभग ७० टीकायें लिखी गयीं और इसको आदर्श मानकर प्रचूर मात्रा में सन्देश काव्यों की रचनायें की गयीं। आलोचकों ने 'मेघे माघे गतं वयः' कहकर इसकी महत्ता प्रदर्शित की।
३. कुमारसम्भवम्-यह एक महाकाव्य है। इसमें कुल सत्रह सर्ग हैं। मल्लिनाथ ने प्रारम्भिक आठ सर्गों पर ही टीका लिखी है और परवर्ती अलङ्कारशास्त्रियों ने इन्हीं आठ सर्गों के पद्यों को अपने ग्रन्थों में उद्धृत किया है। इसलिए विद्वान् प्रारम्भिक आठ सर्गों को ही कालिदास द्वारा विरचित मानते हैं । इस महाकाव्य में शिव के पुत्र कुमार की कथा वर्णित है। कुमार को षाण्मातुर, कार्तिकेय तथा स्कन्द भी कहा जाता है । इसकी शैली मनोरम एवं प्रभावशाली है । भगवान् शङ्कर के द्वारा मदनदहन, रतिविलाप, पार्वती की तप:साधना तथा शिव-पार्वती के प्रणय-प्रसंग आदि का वृत्तान्त बड़े ही कमनीय ढंग से वर्णित है जिससे सरसजनों का मन इसमें रमता है।
४. रघुवंशम्-उन्नीस सर्गों में रचित कालिदास का यह सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसमें राजा दिलीप से प्रारम्भ कर अग्निवर्ण तक के सूर्यवंशी राजाओं की कथाओं का काव्यात्मक वर्णन है । सूर्यवंशी राजाओं में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वर्णन हेतु महाकवि ने छः सर्गों ( १०-१५ ) को निबद्ध किया है।
कालिदास की इस कृति में लक्षण ग्रन्थों में प्रतिपादित महाकाव्य का सम्पूर्ण लक्षण घटित हो जाता है । इस महाकाव्य में कालिदास की काव्यप्रतिभा एवं काव्य-शैली दोनों को खुलकर खेलने का अवसर प्राप्त हुआ है । इसकी रसयोजना, अलङ्कार-विधान, चरित्र-चित्रण तथा प्रकृति-सौन्दर्य आदि सभी अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच कर सहृदय समाज का रसावर्जन करते हुए कालिदास की कीर्ति-कौमुदी को चतुर्दिक बिखेरते हैं। रघुवंश की व्यापकता एव लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उस पर लगभग ४० टीकायें लिखी गयी हैं और इसकी रचना करने के कारण कालिदास को 'रघुकार' की पदवी से विभूषित किया जाता है।
५. मालविकाग्निमित्रम्-यह पाँच अंकों का एक नाटक हैं। इसमें शुङ्गवंशीय राजा अग्निमित्र तथा मालविका की प्रणय कथा का मनोहर तथा हृदयहारी चित्रण है। इस गवलासा राजाओं के अन्त:पर में होने वाली कामक्रीडाओं तथा रानियों की पारस्परिक यथार्थ तथा सजीव चित्रण है।
६. विक्रमोर्वशीयम्-इस नाटक में कुल पाँच अङ्ग है । प्राग्वेद आदि में वर्णित चन्द्रवंशीय राजा पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी का प्रेमाख्यान इस नाटक का इतिवृत्त है। परोपकार-परायण पुरूरवा द्वारा अप्सरा उर्वशी का राक्षसों के चंगुल से उद्धार से ही इसकी कथा का प्रारम्भ होता है। तदनन्तर उर्वशी की पुरूरवा के प्रति कामासक्ति और उर्वशी के वियोग में राजा की मदोन्मत्तता प्रतिपाद्य विषय है।
७. अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कालिदास की नाट्य कला की चरम परिणति शाकुन्तल में हुई है। यह भारतीय तथा अभारतीय दोनों प्रकार के आलोचकों में समान आदर का भाजन है। जहाँ एक ओर भारतीय परम्परा 'काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला' कहकर इसकी महनीयता का गुणगान करती है वहीं पाश्चात्त्य जर्मन विद्वान् महाकवि गेटे ‘ऐश्वर्यं यदि वाञ्छसि प्रियसखे शाकुन्तलं सेव्यताम्' कहकर उसके रसास्वाद हेतु सम्पूर्ण जगत् का आह्वान करते हैं। शाकुन्तल में सब मिलाकर सात अङ्क हैं और इसमें पुरुवंशीय नरेश दुष्यन्त तथा कण्व-दुहिता शकुन्तला की प्रणय-कथा का अतीव चित्ताकर्षक एवं मनोरम वर्णन है ।
आज आषाढ माह के प्रथम दिन संस्कृत पंडीत महाकवि कुलगुरु कालिदास ने रामटेक जि.नागपुर के रामगिरी पर्वत पर संस्कृत महाकाव्य "मेघदुतम " की रचना कि थी| आज भी उनका स्मारक रामगिरी पर्वत पर कवि कालिदास की तरह विरह की जिंदगी जी रहा है| ऐसे महाकवी को त्रिवार अभिवादन|
आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानु
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
आषाढ़ मास के पहले दिन पहाड़ की
चोटी पर झुके हुए मेघ को उसने देखा तो
ऐसा जान पड़ा जैसे ढूसा मारने में मगन
कोई हाथी हो।
कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत:
शापेनास्तग्ड:मितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तु:।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।
कोई यक्ष था। वह अपने काम में असावधान
हुआ तो यक्षपति ने उसे शाप दिया कि
वर्ष-भर पत्नी का भारी विरह सहो। इससे
उसकी महिमा ढल गई। उसने रामगिरि के
आश्रमों में बस्ती बनाई जहाँ घने छायादार
पेड़ थे और जहाँ सीता जी के स्नानों द्वारा
पवित्र हुए जल-कुंड भरे थे।
जन्म : पहली से तीसरी शताब्दी के बीच ईस पूर्व माना जाता है।
पत्नी : राजकुमारी विद्योत्तमा।
आरंभिक जीवन:
कालिदास किस काल में हुए और वे मूलतः किस स्थान के थे इसमें काफ़ी विवाद है। चूँकि, कालिदास ने द्वितीय शुंग शासक अग्निमित्र को नायक बनाकर मालविकाग्निमित्रम् नाटक लिखा और अग्निमित्र ने १७० ईसापू्र्व में शासन किया था, अतः कालिदास के समय की एक सीमा निर्धारित हो जाती है कि वे इससे पहले नहीं हुए हो सकते। छठीं सदी ईसवी में बाणभट्ट ने अपनी रचना हर्षचरितम् में कालिदास का उल्लेख किया है तथा इसी काल के पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में कालिदास का जिक्र है अतः वे इनके बाद के नहीं हो सकते। इस प्रकार कालिदास के प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईसवी के मध्य होना तय है। दुर्भाग्यवश इस समय सीमा के अन्दर वे कब हुए इस पर काफ़ी मतभेद हैं। विद्वानों में द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व का मत। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत। तृतीय शताब्दी ईसवी का मत। चतुर्थ शताब्दी ईसवी का मत। पाँचवी शताब्दी ईसवी का मत, तथा। छठीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का मत प्रचलित थे। इनमें ज्यादातर खण्डित हो चुके हैं या उन्हें मानने वाले इक्के दुक्के लोग हैं किन्तु मुख्य संघर्ष प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत और चतुर्थ शताब्दी ईसवी का मत में है।
कालिदास के जन्मस्थान के बारे में भी विवाद है। मेघदूतम् में उज्जैन के प्रति उनकी विशेष प्रेम को देखते हुए कुछ लोग उन्हें उज्जैन का निवासी मानते हैं।
साहित्यकारों ने ये भी सिद्ध करने का प्रयास किया है कि कालिदास का जन्म उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था। कालिदास ने यहीं अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की थी औऱ यहीं पर उन्होंने मेघदूत, कुमारसंभव औऱ रघुवंश जैसे महाकाव्यों की रचना की थी। कविल्ठा चारधाम यात्रा मार्ग में गुप्तकाशी में स्थित है। गुप्तकाशी से कालीमठ सिद्धपीठ वाले रास्ते में कालीमठ मंदिर से चार किलोमीटर आगे कविल्ठा गांव स्थित है। कविल्ठा में सरकार ने कालिदास की प्रतिमा स्थापित कर एक सभागार की भी निर्माण करवाया है। जहां पर हर साल जून माह में तीन दिनों तक गोष्ठी का आयोजन होता है, जिसमें देशभर के विद्वान भाग लेते हैं।
महाकवि कालिदास चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के राजकवि थे। वह शिव भक्त थे। उनके गंथो के मंगल श्लोको से इस बात की पुष्टि होती है। मेघदूत और रघुवशो के वर्णन से पता चलता है की उन्होंने भारत की यात्रा की थी।
इसी कारण उनके काव्यों में भोगोलिक वर्णन , स्व्भविक और मनोरम हुए ।महाकवि कालिदास का प्रकृति के साथ घनिष्ट संभंध रहा , वह प्रकृति को सजीव और मानवीय भावनायो से परिपूर्ण मानते थे उनके अनुसार मानव के सामान यह भी सुख दुःख का अनुभव करती है सकुंतला की विदा पर आश्रम के पशु पछि भी विचलित हो जाते हैं। हिरनी कोमल पुष्प खाना छोड़ देती है , मोर नाचना बंद कर देती है , लताये अपने पत्ते गिरा कर मनो अपनी सखी के वियोग में रो रहे हो अभिज्ञानशाकुंतलम। उनकी कविताये बहुत मनोरम है और सर्वश्रेष्ठ ,मानी जाती है अभिज्ञानशाकुंतलम के ४ अंक में कालिदास ने शकुलतल की विदा बेला पर प्रकृति द्वारा शकुलतल को दी गयी भेंट का बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। किसी पेड़ ने चंद्रमा के जैसा सफ़ेद मांगलिक रेशमी वस्त्र दिया किसी ने पैरो को रंगने के लिए आलता दिया , अन्य पेड़ो ने कलाई तक उठे हुए सुन्दर कोपलो की प्रति स्पर्धा करने वाले वनदेवता के करतला से आभूषण दिएl
काव्यसौंदर्य:
कालिदास अपनी विषय-वस्तु देश की सांस्कृतिक विरासत से लेते हैं और उसे वे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप ढाल देते हैं। उदाहरणार्थ, अभिज्ञान शाकुन्तल की कथा में शकुन्तला चतुर, सांसारिक युवा नारी है और दुष्यन्त स्वार्थी प्रेमी है। इसमें कवि तपोवन की कन्या में प्रेमभावना के प्रथम प्रस्फुटन से लेकर वियोग, कुण्ठा आदि की अवस्थाओं में से होकर उसे उसकी समग्रता तक दिखाना चाहता है। उन्हीं के शब्दों में नाटक में जीवन की विविधता होनी चाहिए और उसमें विभिन्न रुचियों के व्यक्तियों के लिए सौंदर्य और माधुर्य होना चाहिए।
त्रैगुण्योद्भवम् अत्र लोक-चरितम् नानृतम् दृश्यते। नाट्यम् भिन्न-रुचेर जनस्य बहुधापि एकम् समाराधनम्।। कालिदास के जीवन के बारे में हमें विशेष जानकारी नहीं है। उनके नाम के बारे में अनेक किवदन्तियां प्रचलित हैं जिनका कोई ऐतिहासिक मूल्य नहीं है। उनकी कृतियों से यह विदित होता है कि वे ऐसे युग में रहे जिसमें वैभव और सुख-सुविधाएं थीं। संगीत तथा नृत्य और चित्र-कला से उन्हें विशेष प्रेम था। तत्कालीन ज्ञान-विज्ञान, विधि और दर्शन-तंत्र तथा संस्कारों का उन्हें विशेष ज्ञान था।
जो बात यह महान कलाकार अपनी लेखिनी के स्पर्श मात्र से कह जाता है। अन्य अपने विशद वर्णन के उपरांत भी नहीं कह पाते। कम शब्दों में अधिक भाव प्रकट कर देने और कथन की स्वाभाविकता के लिए कालिदास प्रसिद्ध हैं। उनकी उक्तियों में ध्वनि और अर्थ का तादात्मय मिलता है। उनके शब्द-चित्र सौन्दर्यमय और सर्वांगीण सम्पूर्ण हैं, जैसे – एक पूर्ण गतिमान राजसी रथ, दौड़ते हुए मृग-शावक, उर्वशी का फूट-फूटकर आंसू बहाना, चलायमान कल्पवृक्ष की भांति अन्तरिक्ष में नारद का प्रकट होना, उपमा और रूपकों के प्रयोग में वे सर्वोपरि हैं।
मालविकाग्निमित्रम् कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र के प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है, और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।
अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है।
कालिदास का नाटक विक्रमोर्वशीयम बहुत रहस्यों भरा है। इसमें पुरूरवा इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम करने लगते हैं। पुरूरवा के प्रेम को देखकर उर्वशी भी उनसे प्रेम करने लगती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने जाती है तो पुरूरवा से प्रेम के कारण वह वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है। इससे इंद्र गुस्से में उसे शापित कर धरती पर भेज देते हैं। हालांकि, उसका प्रेमी अगर उससे होने वाले पुत्र को देख ले तो वह फिर स्वर्ग लौट सकेगी। विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौंदर्य और शिल्प से भरपूर है
अपने कुमारसम्भव महाकाव्य में पार्वती के रूप का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने लिखा है कि संसार में जितने भी सुन्दर उपमान हो सकते हैं उनका समुच्चय इकट्ठा करके, फिर उसे यथास्थान संयोजित करके विधाता ने बड़े जतन से उस पार्वती को गढ़ा था, क्योंकि वे सृष्टि का सारा सौन्दर्य एक स्थान पर देखना चाहते थे।[10]वास्तव में पार्वती के सम्बन्ध में कवि की यह उक्ति स्वयं उसकी अपनी कविता पर भी उतनी ही खरी उतरती है। एकस्थसौन्दर्यदिदृक्षा उसकी कविता का मूल प्रेरक सूत्र है, जो सिसृक्षा को स्फूर्त करता है। इस सिसृक्षा के द्वारा कवि ने अपनी अद्वैत चैतन्य रूप प्रतिमा को विभिन्न रमणीय मूर्तियों में बाँट दिया है। जगत की सृष्टि के सम्बन्ध में इस सिसृक्षा को अन्तर्निहित मूल तत्त्व बताकर महाकवि ने अपनी काव्यसृष्टि की भी सांकेतिक व्याख्या की है।
गुरु:----
तुलसीदास के गुरु के रुप में कई व्यक्तियों के नाम लिए जाते हैं। भविष्यपुराण के अनुसार राघवानंद, विलसन के अनुसार जगन्नाथ दास, सोरों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार नरसिंह चौधरी तथा ग्रियर्सन एवं अंतर्साक्ष्य के अनुसार नरहरि तुलसीदास के गुरु थे। राघवनंद के एवं जगन्नाथ दास गुरु होने की असंभवता सिद्ध हो चुकी है। वैष्णव संप्रदाय की किसी उपलब्ध सूची के आधार पर ग्रियर्सन द्वारा दी गई सूची में, जिसका उल्लेख राघवनंद तुलसीदास से आठ पीढ़ी पहले ही पड़ते हैं। ऐसी परिस्थिति में राघवानंद को तुलसीदास का गुरु नहीं माना जा सकता।
माता-पिता:-
तुलसीदास के माता पिता के संबंध में कोई ठोस जानकारी नहीं है। प्राप्त सामग्रियों और प्रमाणों के अनुसार उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था। किन्तु भविष्यपुराण में उनके पिता का नाम श्रीधर बताया गया है। रहीम के दोहे के आधार पर माता का नाम हुलसी बताया जाता है।
महाकाव्य:--
इन नाटकों के अलावा कालिदास ने दो महाकाव्यों और दो गीतिकाव्यों की भी रचना की। रघुवंशम् और कुमारसंभवम् उनके महाकाव्यों के नाम है। रघुवंशम् में सम्पूर्ण रघुवंश के राजाओं की गाथाएँ हैं, तो कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।
मेघदूतम् और ऋतुसंहारः उनके गीतिकाव्य हैं। मेघदूतम् में एक विरह-पीड़ित निर्वासित यक्ष एक मेघ से अनुरोध करता है कि वह उसका संदेश अलकापुरी उसकी प्रेमिका तक लेकर जाए, और मेघ को रिझाने के लिए रास्ते में पड़ने वाले सभी अनुपम दृश्यों का वर्णन करता है। ऋतुसंहार में सभी ऋतुओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
रचनाएं:--
•श्यामा दंडकम्
•ज्योतिर्विद्याभरणम्
•श्रृंगार रसाशतम्
•सेतुकाव्यम्
•श्रुतबोधम्
•श्रृंगार तिलकम्
•कर्पूरमंजरी
•पुष्पबाण विलासम्
•अभ्रिज्ञान शकुंन्त्लम
•विक्रमौर्वशीय
•मालविकाग्निमित्रम
हरिः ॐ तत्सत्