Friday, January 15, 2021

महाकवि कालिदास एवं उनकी रचनां।

 

  महाकवि कालिदास का 'मेघदूतम्' साहित्य-जगत् की अमूल्य निधि है । कालिदास के इस काव्य में वैसे तत्कालीन उत्तर भारत के विभिन्न स्थलों का रमणीक चित्रांकन है, तथापि महाकवि का दो नगरियों से विशेष लगाव प्रदर्शित होता है : एक उज्जयिनी और दूसरी अलकापुरी । उज्जयिनी के चित्रांकन में महाकवि ने अपनी प्रतिभा के बहु आयामों का परिचय देते हुए उस पर १४ श्लोक रचे हैं । इस लगाव-विशेष का कारण कालिदास का उज्जयिनी-निवासी होना रहा है । अपनी मातृभूमि से भला कौन स्नेह नहीं करता ! उज्जयिनी के प्रति कालिदास का आग्रहपूर्ण लगाव इस सीमा तक पहुँचा है कि वे मेघ को सीधे और छोटे मार्ग को त्याग कर टेड़े मार्ग से उज्जयिनी होते हुए अलकापुरी जाने की सलाह तक दे डालते हैं । उज्जयिनी से सम्बन्धित श्लोकों का सिलसिलेवार प्रस्तुतीकरण मैं पहले फ़ेसबुक-पटल पर कर चुका हूँ । अलकापुरी चूँकि मेघ का गन्तव्य स्थल है और वहाँ उसके नायक यक्ष की प्रिया रहती है, अत: कालिदास अलकापुरी के वर्णन में भी लगभग इतने ही श्लोकों में अपने काव्य-कौशल की छटा बिखरते प्रतीत होते हैं । 

         वैसे तो 'पूर्वमेघ' के अन्तिम श्लोक से ही गंगा की उपत्यका में बसी अलकापुरी का चित्रण प्रारम्भ हो जाता है, लेकिन अलकापुरी-वर्णन के शेष सभी श्लोक 'उत्तरमेघ' में स्थान पाये हैं । 'उत्तरमेघ' के प्रथम श्लोक 'विद्युत्वन्तं ललितवनिता....' को मैं सानुवाद पहले इसी पटल पर प्रकाशित कर चुका हूँ जिसमें अलकापुरी के भव्य उत्तुंग प्रासादों का अत्यन्त रमणीक चित्रण है । 'उत्तरमेघ' का दूसरा श्लोक अलकापुरी की सुन्दर अंगनाओं को समर्पित है । इस श्लोक में विभिन्न पुष्पों से सजी-धजी अलकापुरी की सुन्दर बालाओं का मनोहारी चित्र महाकवि ने प्रस्तुत किया है । उत्तरमेघ का यह श्लोक जहाँ उल्लेख अलंकार से चमत्कृत है, वहीं इस अर्थ में भी सविशेष है कि भारत में सभी ऋतुओं में खिलने वाले विभिन्न पुष्पों की उपलब्धता हर वक्त अलका में दर्शायी गयी है । कवि के प्रिय नायक की नगरी, भला, क्यों न सब लोकों से न्यारी हो !
शापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ
शेषान्मासान्गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा ।
पश्चादावां विरहगुणितं तं तमात्माभिलाषं
निर्विक्ष्याव: परिणतसरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥
आज कालिदास याद आ रहे हैं। कालिदास अपने शाप से मुक्ति के प्रति आश्वस्त हैं परन्तु हमें बंधन से मुक्त नहीं करा सके।
खैर मैं कालिदास को अपनी इच्छा के अनुकूल याद नहीं कर सका परंतु आपको कालिदास की कृतियों से परिचय करा देता हूं ।
 महाकवि कालिदास महाकाव्य, खण्ड-काव्य तथा नाट्य-तीनों काव्यविधाओं की रचना में कुशल थे। कालिदास के परवर्ती संस्कृत-साहित्य पर इनका प्रभाव पड़ा है। यहां तक कि कई कवियों ने अमरता प्राप्त करने के लिये अपनी रचनाओं के साथ कालिदास का नाम भी जोड़ दिया। परिणामस्वरूप यह विषय निर्विवाद नहीं रह सका कि कालिदास की वास्तविक रचनायें कितनी हैं ? कालिदास के नाम पर विरचित जिन कृतियों का नाम लिया जाता है, उनमें प्रमुख कृतियाँ निम्नाङ्कित हैं 
१. ऋतुसंहार २. कुमारसम्भव ३. मेघदूत ४. रघुवंश ५. मालविकाग्निमित्र ६. विक्रमोर्वशीय ७. अभिज्ञानशाकुन्तल ८. श्रुतबोध ९. राक्षसकाव्य १०. शृङ्गारतिलक ११. गङ्गाष्टक १२. श्यामलादण्डक १३. नलोदयकाव्य १४.पुष्पबाणविलास १५. ज्योतिर्विदाभरण १६. कुन्तलेश्वरदौत्य १७. लम्बोदर प्रहसन १८. सेतु-बन्ध तथा १९. कालिस्तोत्र आदि। 
उक्त कृतियों में संख्या दो से लेकर संख्या सात तक की रचनायें निर्विवाद रूप से कालिदास की मानी जाती हैं। प्रथम कृति 'ऋतु-संहार' के बारे में विद्वान् एकमत नहीं है परन्तु परम्परा उसे भी कालिदास की कृति स्वीकार करती है । अतः इन्हीं सात कृतियों को कालिदास की रचना मानकर उनका परिचय दिया जा रहा है। 
काव्य-विधा की दृष्टि से उक्त सात कृतियों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है - 
१. गीति-काव्य अथवा खण्ड काव्य-(क) ऋतुसंहार (ख) मेघदूत । २. महाकाव्य-(क) कुमारसम्भव (ख) रघुवंश । 
३. नाट्य अथवा दृश्य काव्य—(क) मालविकाग्निमित्र (ख) विक्रमोर्वशीय (ग) अभिज्ञानशाकुन्तल। 
इन सात कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है 
१. ऋतुसंहार-यह कालिदास की प्रथम रचना मानी जाती है । इसमें कुल छ: सर्ग हैं और उनमें क्रमश: ग्रीष्म, वर्षा, शरद् , हेमन्त, शिशिर तथा वसन्त इन छ: ऋतुओं का अत्यन्त स्वाभाविक, सरस एवं सरल वर्णन है । इसमें ऋतुओं का सहृदयजनों के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव का भी हृदयग्राही चित्रण है । प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण हृदय को अत्यन्त आह्लादित करता है। इस काव्य में कालिदास की कमनीय शैली के दर्शन होने के कारण कुछ विद्वान् इसे कालिदास की रचना नहीं मानते। 
२. मेघदूतम्-यह एक खण्ड-काव्य अथवा गीति-काव्य है । इसके दो भाग हैं(१) पूर्वमेघ (२) उत्तरमेघ । इसमें अपनी वियोग-विधुरा कान्ता के पास वियोगी यक्ष मेघ के द्वारा अपना प्रणय-संदेश भेजता है। पूर्वमेघ में महाकवि, रामगिरि से लेकर अलका तक के मार्ग का विशद वर्णन करते समय, भारतवर्ष की प्राकृतिक छटा का एक अतीव हृदयग्राही चित्र खडा कर देता है। वस्तुतः पूर्वमेघ में बाह्य-प्रकृति का सजीव चित्र आँखों के नाचने लगता है । उत्तरमेघ में मानव की अन्तः प्रकृति का ऐसा विशद चित्रण सहदय का चित्त-चञ्चरीक नाच उठता है। 
इस खण्ड-काव्य ने कालिदास को सहृदय जनों के मानस मन्दिर में महनीय स्थान का भागी बना दिया है। इसकी महत्ता का आकलन इसी से किया जा सकता है कि इस पर लगभग ७० टीकायें लिखी गयीं और इसको आदर्श मानकर प्रचूर मात्रा में सन्देश काव्यों की रचनायें की गयीं। आलोचकों ने 'मेघे माघे गतं वयः' कहकर इसकी महत्ता प्रदर्शित की। 
३. कुमारसम्भवम्-यह एक महाकाव्य है। इसमें कुल सत्रह सर्ग हैं। मल्लिनाथ ने प्रारम्भिक आठ सर्गों पर ही टीका लिखी है और परवर्ती अलङ्कारशास्त्रियों ने इन्हीं आठ सर्गों के पद्यों को अपने ग्रन्थों में उद्धृत किया है। इसलिए विद्वान् प्रारम्भिक आठ सर्गों को ही कालिदास द्वारा विरचित मानते हैं । इस महाकाव्य में शिव के पुत्र कुमार की कथा वर्णित है। कुमार को षाण्मातुर, कार्तिकेय तथा स्कन्द भी कहा जाता है । इसकी शैली मनोरम एवं प्रभावशाली है । भगवान् शङ्कर के द्वारा मदनदहन, रतिविलाप, पार्वती की तप:साधना तथा शिव-पार्वती के प्रणय-प्रसंग आदि का वृत्तान्त बड़े ही कमनीय ढंग से वर्णित है जिससे सरसजनों का मन इसमें रमता है। 
४. रघुवंशम्-उन्नीस सर्गों में रचित कालिदास का यह सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसमें राजा दिलीप से प्रारम्भ कर अग्निवर्ण तक के सूर्यवंशी राजाओं की कथाओं का काव्यात्मक वर्णन है । सूर्यवंशी राजाओं में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वर्णन हेतु महाकवि ने छः सर्गों ( १०-१५ ) को निबद्ध किया है। 
कालिदास की इस कृति में लक्षण ग्रन्थों में प्रतिपादित महाकाव्य का सम्पूर्ण लक्षण घटित हो जाता है । इस महाकाव्य में कालिदास की काव्यप्रतिभा एवं काव्य-शैली दोनों को खुलकर खेलने का अवसर प्राप्त हुआ है । इसकी रसयोजना, अलङ्कार-विधान, चरित्र-चित्रण तथा प्रकृति-सौन्दर्य आदि सभी अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच कर सहृदय समाज का रसावर्जन करते हुए कालिदास की कीर्ति-कौमुदी को चतुर्दिक बिखेरते हैं। रघुवंश की व्यापकता एव लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उस पर लगभग ४० टीकायें लिखी गयी हैं और इसकी रचना करने के कारण कालिदास को 'रघुकार' की पदवी से विभूषित किया जाता है। 
५. मालविकाग्निमित्रम्-यह पाँच अंकों का एक नाटक हैं। इसमें शुङ्गवंशीय राजा अग्निमित्र तथा मालविका की प्रणय कथा का मनोहर तथा हृदयहारी चित्रण है। इस गवलासा राजाओं के अन्त:पर में होने वाली कामक्रीडाओं तथा रानियों की पारस्परिक यथार्थ तथा सजीव चित्रण है।
६. विक्रमोर्वशीयम्-इस नाटक में कुल पाँच अङ्ग है । प्राग्वेद आदि में वर्णित चन्द्रवंशीय राजा पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी का प्रेमाख्यान इस नाटक का इतिवृत्त है। परोपकार-परायण पुरूरवा द्वारा अप्सरा उर्वशी का राक्षसों के चंगुल से उद्धार से ही इसकी कथा का प्रारम्भ होता है। तदनन्तर उर्वशी की पुरूरवा के प्रति कामासक्ति और उर्वशी के वियोग में राजा की मदोन्मत्तता प्रतिपाद्य विषय है। 
७. अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कालिदास की नाट्य कला की चरम परिणति शाकुन्तल में हुई है। यह भारतीय तथा अभारतीय दोनों प्रकार के आलोचकों में समान आदर का भाजन है। जहाँ एक ओर भारतीय परम्परा 'काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला' कहकर इसकी महनीयता का गुणगान करती है वहीं पाश्चात्त्य जर्मन विद्वान् महाकवि गेटे ‘ऐश्वर्यं यदि वाञ्छसि प्रियसखे शाकुन्तलं सेव्यताम्' कहकर उसके रसास्वाद हेतु सम्पूर्ण जगत् का आह्वान करते हैं। शाकुन्तल में सब मिलाकर सात अङ्क हैं और इसमें पुरुवंशीय नरेश दुष्यन्त तथा कण्व-दुहिता शकुन्तला की प्रणय-कथा का अतीव चित्ताकर्षक एवं मनोरम वर्णन है ।

आज आषाढ माह के प्रथम दिन संस्कृत पंडीत महाकवि कुलगुरु कालिदास ने रामटेक जि.नागपुर के रामगिरी पर्वत पर संस्कृत महाकाव्य "मेघदुतम " की रचना कि थी| आज भी उनका स्मारक रामगिरी पर्वत पर कवि कालिदास की तरह विरह की जिंदगी जी रहा है| ऐसे महाकवी को त्रिवार अभिवादन|
          
           आषाढस्‍य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्‍टसानु
            वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
आषाढ़ मास के पहले दिन पहाड़ की
चोटी पर झुके हुए मेघ को उसने देखा तो
ऐसा जान पड़ा जैसे ढूसा मारने में मगन
कोई हाथी हो।
    
    कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:
     शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।
     यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु
     स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।

कोई यक्ष था। वह अपने काम में असावधान
हुआ तो यक्षपति ने उसे शाप दिया कि
वर्ष-भर पत्‍नी का भारी विरह सहो। इससे
उसकी महिमा ढल गई। उसने रामगिरि के
आश्रमों में बस्‍ती बनाई जहाँ घने छायादार
पेड़ थे और जहाँ सीता जी के स्‍नानों द्वारा
पवित्र हुए जल-कुंड भरे थे।

  जन्म : पहली से तीसरी शताब्दी के बीच ईस पूर्व माना जाता है।

  पत्नी : राजकुमारी विद्योत्तमा।

  आरंभिक जीवन:

  कालिदास किस काल में हुए और वे मूलतः किस स्थान के थे इसमें काफ़ी विवाद है। चूँकि, कालिदास ने द्वितीय शुंग शासक अग्निमित्र को नायक बनाकर मालविकाग्निमित्रम् नाटक लिखा और अग्निमित्र ने १७० ईसापू्र्व में शासन किया था, अतः कालिदास के समय की एक सीमा निर्धारित हो जाती है कि वे इससे पहले नहीं हुए हो सकते। छठीं सदी ईसवी में बाणभट्ट ने अपनी रचना हर्षचरितम् में कालिदास का उल्लेख किया है तथा इसी काल के पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में कालिदास का जिक्र है अतः वे इनके बाद के नहीं हो सकते। इस प्रकार कालिदास के प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईसवी के मध्य होना तय है। दुर्भाग्यवश इस समय सीमा के अन्दर वे कब हुए इस पर काफ़ी मतभेद हैं। विद्वानों में द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व का मत। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत। तृतीय शताब्दी ईसवी का मत। चतुर्थ शताब्दी ईसवी का मत। पाँचवी शताब्दी ईसवी का मत, तथा। छठीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का मत प्रचलित थे। इनमें ज्यादातर खण्डित हो चुके हैं या उन्हें मानने वाले इक्के दुक्के लोग हैं किन्तु मुख्य संघर्ष प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत और चतुर्थ शताब्दी ईसवी का मत में है।

  कालिदास के जन्मस्थान के बारे में भी विवाद है। मेघदूतम् में उज्जैन के प्रति उनकी विशेष प्रेम को देखते हुए कुछ लोग उन्हें उज्जैन का निवासी मानते हैं।

  साहित्यकारों ने ये भी सिद्ध करने का प्रयास किया है कि कालिदास का जन्म उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था। कालिदास ने यहीं अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की थी औऱ यहीं पर उन्होंने मेघदूत, कुमारसंभव औऱ रघुवंश जैसे महाकाव्यों की रचना की थी। कविल्ठा चारधाम यात्रा मार्ग में गुप्तकाशी में स्थित है। गुप्तकाशी से कालीमठ सिद्धपीठ वाले रास्ते में कालीमठ मंदिर से चार किलोमीटर आगे कविल्ठा गांव स्थित है। कविल्ठा में सरकार ने कालिदास की प्रतिमा स्थापित कर एक सभागार की भी निर्माण करवाया है। जहां पर हर साल जून माह में तीन दिनों तक गोष्ठी का आयोजन होता है, जिसमें देशभर के विद्वान भाग लेते हैं।
महाकवि कालिदास चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के राजकवि थे। वह शिव भक्त थे। उनके गंथो के मंगल श्लोको से इस बात की पुष्टि होती है। मेघदूत और रघुवशो के वर्णन से पता चलता है की उन्होंने भारत की यात्रा की थी।
इसी कारण उनके काव्यों में भोगोलिक वर्णन , स्व्भविक और मनोरम हुए ।महाकवि कालिदास का प्रकृति के साथ घनिष्ट संभंध रहा , वह प्रकृति को सजीव और मानवीय भावनायो से परिपूर्ण मानते थे उनके अनुसार मानव के सामान यह भी सुख दुःख का अनुभव करती है सकुंतला की विदा पर आश्रम के पशु पछि भी विचलित हो जाते हैं। हिरनी कोमल पुष्प खाना छोड़ देती है , मोर नाचना बंद कर देती है , लताये अपने पत्ते गिरा कर मनो अपनी सखी के वियोग में रो रहे हो अभिज्ञानशाकुंतलम। उनकी कविताये बहुत मनोरम है और सर्वश्रेष्ठ ,मानी जाती है अभिज्ञानशाकुंतलम के ४ अंक में कालिदास ने शकुलतल की विदा बेला पर प्रकृति द्वारा शकुलतल को दी गयी भेंट का बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। किसी पेड़ ने चंद्रमा के जैसा सफ़ेद मांगलिक रेशमी वस्त्र दिया किसी ने पैरो को रंगने के लिए आलता दिया , अन्य पेड़ो ने कलाई तक उठे हुए सुन्दर कोपलो की प्रति स्पर्धा करने वाले वनदेवता के करतला से आभूषण दिएl

  काव्यसौंदर्य:

  कालिदास अपनी विषय-वस्तु देश की सांस्कृतिक विरासत से लेते हैं और उसे वे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप ढाल देते हैं। उदाहरणार्थ, अभिज्ञान शाकुन्तल की कथा में शकुन्तला चतुर, सांसारिक युवा नारी है और दुष्यन्त स्वार्थी प्रेमी है। इसमें कवि तपोवन की कन्या में प्रेमभावना के प्रथम प्रस्फुटन से लेकर वियोग, कुण्ठा आदि की अवस्थाओं में से होकर उसे उसकी समग्रता तक दिखाना चाहता है। उन्हीं के शब्दों में नाटक में जीवन की विविधता होनी चाहिए और उसमें विभिन्न रुचियों के व्यक्तियों के लिए सौंदर्य और माधुर्य होना चाहिए।

त्रैगुण्योद्भवम् अत्र लोक-चरितम् नानृतम् दृश्यते। नाट्यम् भिन्न-रुचेर जनस्य बहुधापि एकम् समाराधनम्।। कालिदास के जीवन के बारे में हमें विशेष जानकारी नहीं है। उनके नाम के बारे में अनेक किवदन्तियां प्रचलित हैं जिनका कोई ऐतिहासिक मूल्य नहीं है। उनकी कृतियों से यह विदित होता है कि वे ऐसे युग में रहे जिसमें वैभव और सुख-सुविधाएं थीं। संगीत तथा नृत्य और चित्र-कला से उन्हें विशेष प्रेम था। तत्कालीन ज्ञान-विज्ञान, विधि और दर्शन-तंत्र तथा संस्कारों का उन्हें विशेष ज्ञान था।

  जो बात यह महान कलाकार अपनी लेखिनी के स्पर्श मात्र से कह जाता है। अन्य अपने विशद वर्णन के उपरांत भी नहीं कह पाते। कम शब्दों में अधिक भाव प्रकट कर देने और कथन की स्वाभाविकता के लिए कालिदास प्रसिद्ध हैं। उनकी उक्तियों में ध्वनि और अर्थ का तादात्मय मिलता है। उनके शब्द-चित्र सौन्दर्यमय और सर्वांगीण सम्पूर्ण हैं, जैसे – एक पूर्ण गतिमान राजसी रथ, दौड़ते हुए मृग-शावक, उर्वशी का फूट-फूटकर आंसू बहाना, चलायमान कल्पवृक्ष की भांति अन्तरिक्ष में नारद का प्रकट होना, उपमा और रूपकों के प्रयोग में वे सर्वोपरि हैं।

  मालविकाग्निमित्रम् कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र के प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है, और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।

 अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है।

 कालिदास का नाटक विक्रमोर्वशीयम बहुत रहस्यों भरा है। इसमें पुरूरवा इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम करने लगते हैं। पुरूरवा के प्रेम को देखकर उर्वशी भी उनसे प्रेम करने लगती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने जाती है तो पुरूरवा से प्रेम के कारण वह वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है। इससे इंद्र गुस्से में उसे शापित कर धरती पर भेज देते हैं। हालांकि, उसका प्रेमी अगर उससे होने वाले पुत्र को देख ले तो वह फिर स्वर्ग लौट सकेगी। विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौंदर्य और शिल्प से भरपूर है

अपने कुमारसम्भव महाकाव्य में पार्वती के रूप का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने लिखा है कि संसार में जितने भी सुन्दर उपमान हो सकते हैं उनका समुच्चय इकट्ठा करके, फिर उसे यथास्थान संयोजित करके विधाता ने बड़े जतन से उस पार्वती को गढ़ा था, क्योंकि वे सृष्टि का सारा सौन्दर्य एक स्थान पर देखना चाहते थे।[10]वास्तव में पार्वती के सम्बन्ध में कवि की यह उक्ति स्वयं उसकी अपनी कविता पर भी उतनी ही खरी उतरती है। एकस्थसौन्दर्यदिदृक्षा उसकी कविता का मूल प्रेरक सूत्र है, जो सिसृक्षा को स्फूर्त करता है। इस सिसृक्षा के द्वारा कवि ने अपनी अद्वैत चैतन्य रूप प्रतिमा को विभिन्न रमणीय मूर्तियों में बाँट दिया है। जगत की सृष्टि के सम्बन्ध में इस सिसृक्षा को अन्तर्निहित मूल तत्त्व बताकर महाकवि ने अपनी काव्यसृष्टि की भी सांकेतिक व्याख्या की है।

गुरु:----
तुलसीदास के गुरु के रुप में कई व्यक्तियों के नाम लिए जाते हैं। भविष्यपुराण के अनुसार राघवानंद, विलसन के अनुसार जगन्नाथ दास, सोरों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार नरसिंह चौधरी तथा ग्रियर्सन एवं अंतर्साक्ष्य के अनुसार नरहरि तुलसीदास के गुरु थे। राघवनंद के एवं जगन्नाथ दास गुरु होने की असंभवता सिद्ध हो चुकी है। वैष्णव संप्रदाय की किसी उपलब्ध सूची के आधार पर ग्रियर्सन द्वारा दी गई सूची में, जिसका उल्लेख राघवनंद तुलसीदास से आठ पीढ़ी पहले ही पड़ते हैं। ऐसी परिस्थिति में राघवानंद को तुलसीदास का गुरु नहीं माना जा सकता।

 माता-पिता:-
तुलसीदास के माता पिता के संबंध में कोई ठोस जानकारी नहीं है। प्राप्त सामग्रियों और प्रमाणों के अनुसार उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था। किन्तु भविष्यपुराण में उनके पिता का नाम श्रीधर बताया गया है। रहीम के दोहे के आधार पर माता का नाम हुलसी बताया जाता है।

 महाकाव्य:--
इन नाटकों के अलावा कालिदास ने दो महाकाव्यों और दो गीतिकाव्यों की भी रचना की। रघुवंशम् और कुमारसंभवम् उनके महाकाव्यों के नाम है। रघुवंशम् में सम्पूर्ण रघुवंश के राजाओं की गाथाएँ हैं, तो कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।

 मेघदूतम् और ऋतुसंहारः उनके गीतिकाव्य हैं। मेघदूतम् में एक विरह-पीड़ित निर्वासित यक्ष एक मेघ से अनुरोध करता है कि वह उसका संदेश अलकापुरी उसकी प्रेमिका तक लेकर जाए, और मेघ को रिझाने के लिए रास्ते में पड़ने वाले सभी अनुपम दृश्यों का वर्णन करता है। ऋतुसंहार में सभी ऋतुओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

  रचनाएं:--
•श्यामा दंडकम्
•ज्योतिर्विद्याभरणम्
•श्रृंगार रसाशतम्
•सेतुकाव्यम्
•श्रुतबोधम्
•श्रृंगार तिलकम्
•कर्पूरमंजरी
•पुष्पबाण विलासम्
•अभ्रिज्ञान शकुंन्त्लम
•विक्रमौर्वशीय
•मालविकाग्निमित्रम
हरिः ॐ तत्सत्
     

विष्णु सूक्त ऋग्वेद।

विष्नु सूक्त
(१)विष्णोः  नु  कं   वीर्याणि     प्र वोचं , यः प्रार्थिवाणि  विममे रजांसि ।
        यो अस्कभायदुत्तरं   सद्यस्थं  विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः  ।
पदपाठ-  विष्णोः  । नु । कम् । वीर्याणि । प्र । वोचम् । यः । पार्थिवाणि ।  विममे । रजांसि । यः । अस्कभयात् । उततरम् । सद्यस्थ । विचक्रमाणः । त्रेधा । उरुगायस्य ।
अर्थ- अब मै उस विष्णु के वीर कर्मो को प्रस्थापित करुगाँ , जिसने पृथ्वी सम्बन्धी स्थानों को नाप लिया है । तथा तीन प्रकार से पाद न्यास करते हुवे विशाल गतिशील जिसने उर्ध्वस्थ सहनिवासस्थान को स्थिर कर दिया है ।
व्याख्या-(१) प्रवोचम्- तिड़्तिड़ इति सूत्रेण सर्वानुदात्तः भवति । मुख्यवाक्यस्य मुख्यक्रिया रुपं अस्ति, अतः उदात्तस्य लोपः भवति ।
विममे-सायण के अनुसार –निर्माण किया , अन्य विद्वानों के अनुसार नाप लिया (उध्वर,महीप)
पार्थिवाणि-पृथिव्या इमाणि , पृथिवी +अण् ।
(२)अस्कभायत्-  विममे- यद्वृत्तान्नित्यं इति सूत्रेण उदात्तस्य लोपः न अस्ति ।
(३)वीर्याणि – यह वाक्य संधिजन्य नही है , अपितु जात्य स्वरित है ।
(४) कम्- पादपूरण के लिये एक निपात् ।
(५) त्रेधा  का छन्दोनुसार  त्रयेधा होगा ।
(६)उरुगाय- सायण महोदय ने इसका अर्थ विशाल गतिवाले अथवा बहुतों द्वारा स्तूयमान , इस प्रकार किया है । पीटर्सन ने इसका अर्थ ‘दूरगन्ता’ भी किया है ।मैक्डानल –विस्तृत पदवाला , विष्णु के तीन कदम , सूर्य के संक्रमण काल में उदय होना , मध्य में जाना तथा अस्त होना , ये ही विष्णु के तीन कदम है । विशाल पदक्रम वाले यास्क ने प्रतिपातिद किया है ।
(७) सधस्थम्- मैक्डानल- द्युलोक , सायण –अतिविस्तॄत  अन्तरिक्ष (जातलोक सत्यलोक) ।
(२) प्र  तद्विष्णु;  स्तवते   वीर्येण ,  मृगो  न  भीमः   कुचरो  गिरिष्ठा ।
      यस्योरुषु   त्रिषु  विक्रमणे ष्वधिक्षियन्ति    भुवनानि   विश्वा ।
पदपाठ- प्र। तत् ।  विष्णुः । स्तवते । वीर्येण । मृगः । न । भीमः । कुचर ; । गिरिस्था । यस्य; ।        उरुषु । त्रिषु । विक्रमणेषु  । अधिक्षियन्ति । भुवनानि । विश्वा ।
अर्थ- विष्णु  जिसके विशाल तीन कदमों में सम्पूर्ण प्राणी निवास करते है , अपने उन वीरतायुक्त कार्य के कारण स्तुति किया जाता है , जिस प्रकार पर्वत पर रहने वाला तथा अपनी इच्छानुकुल विचरण करने वाला भयानक पशु ।
    व्याख्या-   (१) वीर्येण – यह जात्य स्वरित है । एतद् जात्यस्वरितः अस्ति, न तु संधिजन्यः ।
                   (२) स्तवते- तिड़्तिड़ ; इति सूत्रेण सर्वानुदात्त; भवति ।
                   (३) मृगः-  विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न अर्थ किये है । मृग-्सिंह (सायण) प्रारंभ में सभी जानवरों के लिये प्रयुक्त , परन्तु बाद में मृग का अर्थ हिरण से ही रुढ़ हुवा  । मृग-्बैल (यास्क)  ।
                    (४) तत् पद को लिंग व्यत्यय से पुर्लिंग सः मानना चाहिये  और यह विष्णु का विशेषण है ।
                     (५) प्र इस उपसर्ग का स्तवते क्रिया के साथ अन्वय है ।
                (६) स्तवते- स्तु धातु से कर्म में प्रत्यय करने पर यक् के स्थान में व्यत्यय से शप् हुवा
                      वीर्येण- वीरियेण ।
                वीर्येण –ग्रासमेन- वीर्य- सामर्थ्य , लुडविच- अपनी बल शक्ति के कारण विष्णु प्रशंसित होता है , ऐसा मानते है ।
               (७) गिरिष्ठा- गिरि+स्था   क्विप  या विच्  ।
              (८)मृग – मार्ष्टि    गच्छति इति मृगः
               (९)प्रतद् विष्णु- इस पद में तत् पद का अर्थ सायण ने स्पष्ट नही किया है । स्तवते का अर्थ स्तुयते माना है ।पीटर्सन को यह नापसन्द है , किन्तु पीटर्सन का यह अर्थ अयुक्त है क्योकि ‘स्तवते’ का अर्थ कर्म प्रत्यय मे ही करना चाहिये । किन्तु स्वयं अपने कर्मो की प्रशंसा करता है , यह अर्थ अस्वाभाविक है । वीर्येण को भी पीटर्सन ने शक्ति इस अर्थ में प्रयुक्त मानकर क्रियाविशेषण  माना है । ग्रासमन ने प्रस्तवते का अर्थ तत् को माना तथा वीर्येण का अर्थ भी शक्ति किया है ।
              (१०) अधिक्षियन्ति – अपादादौ  इति सूत्रेण सिद्धः
              (११) विश्वा – आभि का वैकल्पिक रुप आकारं ।
              (१२) कुचरः – दुर्गम प्रदेशयन्ता , हिंसादि कुत्सित कर्म करने वाला ।
             (१३) गिरिष्ठा- पर्वताश्रित  वाणी ।
             (१४)वेद में भुवन का अर्थ प्राणी होता है, सायण ने भूतजातानि प्रयोग किया है ।
(३)     प्र विष्णवे  शूषमेतु  मन्म    गिरिक्षित  उरुगायाय   वृष्ने  ।
          य  इदम्  दीर्घ  प्रयेत्  सधस्थमेको   विममे  त्रिभिरित्पदेभिः ।
पदपाठ-   प्र । विष्णवे । शूषम् । एतु ।  मन्म ।  गिरिक्षित ।  उरुगायाय । वृष्ण । य । इदम् । दीर्घम् । प्रयतम् । सधस्तम् ।  एकः । विममे । त्रिभि ; । इत् । पदेभिः ।
   अर्थ-    (मेरी) शक्तिशाली प्रार्थना , ऊँचे लोको में निवास करने वाले , विशाल कदमों वाले  इच्छाओं की पुर्ति करने वाले , विष्णु के पास जावें , जिसने इस बड़े अतिविस्तृत (पवित्रात्माओं) के मिलन स्थान को अकेले तीन पदों से नापा था ।
व्याख्या-    (१)शूषम्-  बल , बलप्रद , मैक्डानल – उत्साहवर्धक अर्थ लेता है । राँथ  महोदय सायण का अर्थ अर्थ के लिये नही मानता , यह सायण को कर्मकाण्डी अर्थ का द्योतक समझता है
              (२) शूषम् की सिद्धि  राँथ ने ‘श्वस्’ धातु से मानी है । तथा इसे विशेषण भी माना है
              (३)प्रबल प्रतिपक्षी को देखकर शत्रु का बल सुख जाता है  इसलिये बल का नाम ‘शूष्’
              (४) शूष् धातु से घण् प्रत्यय करने पर ‘शूष्’ शब्द की सिद्धी होती है । शूषम् मन्म का विशेषण है ।
                (५) मन्म- मन्त्र, मनन , स्रोत  ।
                (६) विममे- उदात्त का लोप नही , पाद के प्रारम्भ में है ,  यद्वृतान्तनित्यं  ।
                (७)पदेभि;-    अवग्रह से अलग नही दिखाया ।
                (प्रयतम्-   दीर्घ,   विशाल  , नियत   (सायण)  ।
                 (८) वृष्ण-   वर्धनशील  कामानल   (विष्णु) ‘वृषण’  शब्द यद्यपि अनेको बार प्रयुक्त है  तथापि स्पष्ट नही है । तथा यह शब्द  वीर्य सेवता या बलवान अर्थ में प्रयुक्त होता है । धीरे धीरे यह अर्थ परिवर्तित होता गया ।
                    (९) गिरिक्षिते-  उन्नत प्रदेशों में , वाणी मे निवास करता है ।
                    (१०) क्षिति -  पृथ्वी , निवास के अर्थ में , अग्नि वैदिक दैवताओं में पुजक , उनके बीच में स्थायी , भावी नही , दास्य भाव नही , विष्णु वरुण से डरते है , रुद्र से डरते है । हविष्यान्न  कौन दे रहा है । परस्पकम् भावयन्तः  ।
(४)  यस्य त्री पूर्णा  मधुना  पदान्य  अक्षीयमाना  स्वधया मदन्ति ।
      य  उ त्रिधातु  पृथिवीमुत   द्याम् एको  दाधार  भुवनानि  विश्वा ।
पदपाठ -  यस्य । त्री । पूर्णा । मधुना । प्रदानि । अक्षीयमाना । स्वधया । मदन्ति । यः । हूँ इति ।
              त्रिधातु । पृथिवीम् । उत् । द्याम् । एकः । दाधार ; । भुवनानि । विश्वा ।
व्याख्या-  (१) स्वधया – मैकडानल -   स्वधा इति अन्ननाम् (अन्न से प्रसन्न ) राँथ का मत है भारत  वैदिक स्वधा शब्द का पूर्णतया विस्तृत कर चूका है , उनके मत में रितिरिवाज , विधि, नियम , व्यवस्था ।
           (२) अक्षीयमाना- अ+क्षी+शानच्  । छन्दोगति की दृष्टि से पदानि  अक्षीयमाना  पठितव्य  है ।
            (३) मदन्ति-  मादयन्ति     (प्रेरणार्थक )   लेना है ।
             (४) स्वधा-  पितरों के लिये की जाती है । 
             (५) स्वाहा – अच्छे अर्थ में दी जाती है ।
            (६)  स्वधा – विभिन्न संदर्भों में विभिन्न अर्थ है , कुछ विद्वान इसका अर्थ स्वतन्त्रता करते है , सायण तथा मैक्डानल इसका अन्न ही करते है  । राँथ ने इसका अर्थ  स्वीट ड्रिन्क   किया है । प्रोफेसर  राँथ के अनुसार भारतीय परम्परा वैदों के अर्थ जानने में सहायक नही ।
                (७) भुवन् का अर्थ  सायण ने लोक किया है , परन्तु प्राणी अर्थ ज्यादा उपयुक्त है ।
                (८) दाधार – केवल वैदिक रुप । अभ्यास में दीर्घ का ह्रस्व होता है , लैकिन यहाँ नही हुवा , ‘दीर्घोभ्यासस्य”  सूत्र से ।
(५)  तदस्य प्रियमपि  पाथो अस्मां  नरो यत्र देवयवो मदन्ति ।
        उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था , विष्णोः प्रदे परमे मध्व  उत्स ।
पदपाठ- तत् । अस्य । प्रियम् । अभि । पाथ ; । अस्याम् । नरः  । यत्र । देवयव ; । मदन्तिः ।      उरुक्रमस्य ।  स; । हि । बन्धुः  । विष्णो । पदे । परमे । मध्यः । उत्सः ।
अर्थ   -   इस विष्णु के उस प्रिय लोक को मै प्राप्त करुँ जहाँ पर देवताओं के इच्छुक मनुष्य
             आनन्द करते है । विशाल गतिवाले विष्णु के श्रेष्ठ लोक में मधु का एक सरोवर है । इस         
              प्रकार निश्चित ही वह (सबका) मित्र है ।
व्याख्या- पाथ; - ब्रह्म लोक को (सायण)
               यास्क-  पाथो अन्तरिक्षं  पथा व्याख्यातम् । उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था –सायण
              उरुक्रम विष्णु के परम पद में मधु का उत्स है , इस प्रकार वह सबका बन्धु है ।
              पीटर्सन  -यहाँ उरुक्रम विष्णु देव का साहचर्य है , विष्णु के परम पद में मधु का
               उत्स है । मैक्डानल  बन्धु को उत्स के लिये प्रयुक्त मानते है ।
                           उरुक्रमस्य  स हि  बन्धुरित्था –सायण स हि बन्धुरित्था इस प्रकार यह
                 विष्णु निश्चित ही सबका बन्धु है , अर्थ कर इसे निक्षिप्त वाक्य के रुप में पस्तुत
                करते है । ग्रासमन- यहाँ माधुर्य निर्झर है । इस प्रकार राँथ बन्धु को स्वर्ग समान
                 तथा ‘नरो देवयव;’ की समुदायपरक अभिव्यक्ति भी करते है ।
                इत्था- पिशेल अत्र से एत्थ को व्युत्पन्न कर एत्थ और इत्था को समान मानते है । 
(६)      ता वां वास्तुन्युष्मति गमध्यै  यत्र  गावो  भूरिश्रवा अयासं  ।
           अत्राह तदुरुगावस्य  वृष्ण; , परमं  पदमव  भाति भूरिं ।
पदपाठ- ता । वाम् । वास्तूनि । उश्मसि । गमध्यै । यत्र । गाव; । भूरिश्रवा । अयासः । अत्र । अह । तत् । उरुगायस्य । वृष्ण; । परमम् । पदम् । अव । भाति । भूरि ।
अर्थ – तुम दौनों को उन स्थानों पर जाने के लिये मै इच्छा करता हूँ । जहाँ पर बहुत सींग वाली ( अत्यधिक प्रकाशवाली) हमेशा गतिशील रहनेवाली गायें (किरणें) है । यही पर विशाल गतिवाले इच्छाओं की पूर्ति करने वाले (विष्णु) का उस प्रकार का परमधाम  नीचे (हमारी तरफ)  अत्यधिक रुप से प्रकाशित हो रहा है ।
व्याख्या- ता वां  - पत्नि , यजमान की बात है , दो दैवता की नही । मैक्डानल – किसी सहचर दैवता , इन्द्र और विष्णु  , का साथ है । मित्रावरुण भी ।
           गाव; - सूर्य की किरणें , सूर्य-रश्मि (सायण) यास्क भी यही अर्थ करते है ।
           उश्मति -  तिड़ तिड़ इति सूत्रेण सर्वानुदात्तः भवति ।
           अयास; - सायण के अनुसार अय शब्द है , अयास; वैकल्पिक रुप है । मैक्डानल के
          अनुसार यह अकारान्त नही है , सकारान्त है , अया मूलरुप है । अन्यत्र भी अयासौ ,
           अयासं रुप मिलते है ।अव भाति अयास;         यद् वृतान्त नित्यं  इति नियात;  ।
                      प्रस्तुत मंत्र तथा पूर्ववर्ती मंत्रों में लोकान्तर गमन की मान्यता का प्राचीनतम
          बीज माना जा सकता है , और इन मंत्रों को भक्त विद्वानों ने भक्तिकालीन बैकुण्ठधाम 
          गमन की मान्यता का भी आधार माना है ।
       गमध्यै – गम् से तुमर्थ में अध्यै प्रत्यय ।
          गावो भूरिश्रवा – सायण के अनुसार अत्युन्नत सर्वाश्रयणीय किरणें । पीटर्सन – संभवत;
          अगणित  किरणयुक्त तारे । मै. के मतानुसार संभवत; सायण का अर्थ संगत है , उषस्
          रश्मियाँ गायों के साथ तुलित हुई है तथा प्रकाश लोक विष्णु के तृतीय पाद के अनुरुप सूर्य प्रकाश सम्बन्ध पदार्थ ही उपयुक्त है । मै. राँथ पर आधृत पीटर्सन के मत को आधारहीन कहते है ।
            अयास; - सायण- गमनशील , गतिमति , अतिविस्तृत  तथा गतिरहित परम प्रकाश युक्त ।

 राँथ- इसे अ+यास से निष्पन्न करते है । उनके अनुसार इसका अर्थ है – द्रुतगति , तीव्र, सक्रिय , तेज, चुस्त, चालाक, हल्का, विशारद, प्रवीण , दक्ष, विज्ञ, निपुण ।