Thursday, December 17, 2020

सरस्वती वन्दना।


(कुशाग्रविरचितम्)

यां देवीं मुनयो वदन्ति परमं सच्चित्सुखं निर्जरं
वाग्देवीं कवयश्च शुद्धमनसा शक्तीति भक्तादयः।
गीर्वाणाः सुरभारतीं नृपतयो लक्ष्मीं च यां देवतां
वाणी मे वदने सदा वसतु सा विद्याप्रदा शारदा॥१ 

जिस देवी को ऋषि सच्चिदानंद परब्रह्म, शुद्ध मन वाले कवि वाग्देवी, भक्त शक्ति, देवगण सुरभारती, और राजा गण लक्ष्मी कहकर सम्बोधित करते हैं, वह विद्यादायिनी शारदा मेरे मुख में वाणी के रूप में सदा निवास करे।

पादौ पद्मजितौ मुखं रतिजितं यस्याः लताजिद्वपुर्
बाहू कञ्चुकिशुण्डिशुण्डविजितौ नेत्रे उषोनिर्जिते।
कान्तिः कौमुदशर्वरीशविनिकृद् वीणारवो विश्वजिद्
वाणी मे वदने सदा वसतु सा विद्याप्रदा शारदा॥२ 

जिन्होंने पैरों से कमल, मुख से शृंगार, शरीर से लता, हाथों से सर्प और हाथी के सूँड, नेत्र से उषा, कांति से शरद ऋतु का चन्द्रमा, और वीणा के स्वर से संसार भर को जीत लिया, वे सरस्वती देवी मेरे मुख में सदा निवास करें।

या देवी विधिविष्णुशम्भुविनुता हेमेन्दुदेहोज्ज्वला
ब्रह्माणी सितपङ्कजे स्थितवती श्वेताम्बरालङ्कृता।
गायन्ती पिकनादजित्कलरवं कौतूहलानन्ददा
वाणी मे वदने सदा वसतु सा विद्याप्रदा शारदा॥३ 

जो देवी, ब्रह्मा, विष्णु और शिव द्वारा वन्दित, हेम और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल, ब्रह्माणी, श्वेत पंकज पर विराजने वाली, शेवताम्बरा, कोकिल के स्वर को अपने गान से जीतने वाली और कौतूहल-रूपी आनंद देनी वाली है, वह विद्यादायिनी शारदा मेरे मुख में वाणी के रूप में सदा निवास करे।

जिह्वाग्रे जलजासने कविकुले साहित्यवृन्दावने
भक्तानां हृदये मरालविरटे वर्णे स्वरे चाक्षरे।
वीणानादमृदङ्गतालललिते सङ्गीतमूले स्थिता
या वाचं सततं तनोतु मम सा विद्याप्रदा शारदा॥४ 

जो जिह्वा के अग्रभाग, कमल के आसन, कवियों के वंश, साहित्य रूपी वृन्दावन, भक्तों के ह्रदय, हंस के स्कन्ध, वर्ण, स्वर, अक्षर, और वीणा के नाद व मृदंग के ताल से ललित संगीत के मूल में स्थित हैं, वे विद्या प्रदायिनी सरस्वती देवी मेरी वाणी का सदा विस्तार करें।

या विश्वे प्रथमा च विश्वजननी या विश्वसम्भाविता
या विश्वेशकृपाप्रसादफलिता या विश्ववारा शिवा।
या विश्वैककुटुम्बदर्शनसुधामातन्वते विश्वतः
सा विश्वे प्रतिभातु धर्मशिखया श्रीवैदिकी भारती॥५ 

जो विश्व में प्रथम, विश्व की जननी, विश्व द्वारा सम्मानित, जगदीश्वर की कृपा से फलीभूत, विश्व द्वारा वरेण्य, कल्याणमयी, और समस्त विश्व में "वसुधैव कुटुम्बकम्" के दर्शन के अमृत का प्रसार करने वाली है, वह वेदों की सरस्वती विश्व में धर्म की दीपशिखा (लौ) से प्रकाशित होती रहे।

कण्ठे संस्कृतभारती करतले कृष्णानना लेखनी
जिह्वायां कवितासुधा नयनयोर्वर्णाक्षराण्यञ्जनम्।
सद्भक्तिर्हृदि गीतिका श्रवणयोर्या वल्लकीझङ्कृता
सर्वाङ्गे धृतिशीलचन्दनरसः सारस्वताभूषणम्॥६ 

कंठ में संस्कृत वाणी, हाथों में कृष्ण-वर्ण लेखनी, जिह्वा पर कविता की सुधा, नयनों में वर्णाक्षर रूपी अंजन, ह्रदय में सद्भक्ति, कानों में वीणा से झंकृत गीतिका और सभी अंगों में धृति और शील रूपी चन्दन का रस - यही सारस्वत (देवी सरस्वती के अनुरूप अथवा सरस्वती के भक्तों के) आभूषण हैं। 

रसनायां रसानन्दलहरी मम सर्वदा।
वहेद्देवीतमा देवी नदीतमा सरस्वती॥७

मेरी जिह्वा पर रसानन्द की लहरी के रूप में सभी देवियों और नदियों में सर्वोत्तम देवी सरस्वती सदा प्रवाहित होती रहें। 

यस्य नृत्यति जिह्वाग्रे वशीभूता सरस्वती।
पदे पदे पदन्यासैः तं नमामि कवीश्वरम्॥८

जिनकी जिह्वा के अग्रभाग पर सरस्वती स्वयं वशीभूत हो कर पद-पद पर सुन्दर पद-न्यास से नृत्य करती है, मैं उन कविराज को नमस्कार करता हूँ।